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    Manish Chandra Pande May 10, 2011 at 10:23 AM |

    Nice. A different yet balanced and apparently logical perspective. The article was recommended by Naveen Joshi. It was worth the time.
    Rgds

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    प्रमोद जोशी May 10, 2011 at 8:01 PM |

    कॉरपोरेट मीडिया की अंतर्विरोधी भूमिका पर जरूर विचार होना चाहिए, पर यह केवल मीडिया के विश्लेषण का मामला ही नहीं है। पूरी सामाजिक व्यवस्था का प्रश्न है। जो भी मुख्यधारा का मीडिया है उसकी ही भूमिका है। मुझे कोई समानांतर मीडिया नज़र नहीं आता। ऐसा ही नई आर्थिक व्यवस्था के साथ है। इसके विकल्प में कोई व्यवस्था है तो वह क्यों नहीं सामने आती?

    कानून में बदलाव से कुछ नहीं होता तो हम स्त्री अधिकार, दलित-आदिवासी अधिकार, मानवाधिकार वगैरह के कानूनों को लेकर प्रयास क्यों करें? अण्णा हजारे के आंदोलन को मीडिया ने महत्व इसलिए दिया कि देश में एक अर्से से भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा बना है। जो लोग मैच देखकर खुश होते हैं वे पाप नहीं करते। उन्हें देश की दूसरी महत्वपूर्ण समस्याओं की ओर भी ध्यान देना चाहिए, यह बताने की जिम्मेदारी भी मीडिया की है। सिविल सोसायटी को कोसने या मज़ाक बनाने के बजाय रास्ते खोजने चाहिए। यदि ये आंदोलन भटक रहे हैं तो उन्हें रास्ते पर लाने की कोशिश करनी चाहिए। मीडिया को भी रास्ते पर लाया जा सकता है। आखिर उसका पाठक-वर्ग है। आपने कभी पाठकों के किसी आंदोलन का नाम सुना? दर्शक और पाठक अपने मीडिया से कभी शिकायत करते हैं? यह भी सच है कि विनायक सेन या हेम पांडे का सवाल भी इसी मीडिया के मार्फत उठा। फिर भी मीडिया के आचरण पर गम्भीर अध्ययनों की ज़रूरत है। मुझे वह अध्ययन होता नज़र नहीं आता बल्कि आवेशभरी व्यक्तिगत टिप्पणियाँ दिखाई पड़ती हैं।

    आपके लेख से मुझे असहमति नहीं है। पर उसके पीछे छिपे अफसोस पर अफसोस है। हमारा मीडिया तेजी से विस्तार कर रहा है। उसका फायदा उठाने की प्रवृत्ति बड़ी है। इसमें हिन्दी क्षेत्र सबसे आगे है। हिन्दी क्षेत्र के मीडिया के विकास को देखें तो पाएंगे कि ज्यादातर छोटे उद्यमियों ने स्थानीय राजनेताओं से गठजोड़ करके व्यवसायिक सफलता हासिल की। इसके समानांतर पाठकों का विकास नहीं हो रहा है। संजीदा पाठक अपने अखबारों और चैनलों से असहमत है, पर एक तरफ मुखर होकर अपनी बात नहीं कह पाता दूसरी ओर एक संजीदा पाठक के मुकाबले बीस नए पाठक जुड़ रहे हैं।

    यही बात मीडिया की संजीदगी की है। वहाँ भी एक संजीदा पत्रकार पर बीस नए पत्रकार आ रहे हैं। उनका प्रशिक्षण पर्याप्त नहीं है। उनकी आकांक्षाएं भी फर्क हैं। खुद को आगे लाने को आतुर स्मार्ट पत्रकारों की तादाद बड़ी है। यह सब ज्यादा नहीं चलेगा। हमारे देश के मुकाबले यूरोपीय देशों में बाजार-व्यवस्था ज्यादा प्रभावशाली है। वहाँ के मीडिया में वह विद्रूप देखने को नहीं मिलता जो हमारे यहाँ है। मैं उनके मीडिया को आदर्श नही कह रहा हूँ, पर अपने मीडिया से बेहतर समझता हूँ। इतने दोष के बाद भी यही मीडिया कुछ न कुछ सवाल उठाता है।

    मुझे पूरा यकीन है कि मुख्यधारा का विश्वसनीय और व्यावसायिक मीडिया सम्भव है। चेन्नई के द हिन्दू के संचालक परिवार में आपसी विवाद के बावजूद बेहतर पत्रकारिता की परम्परा है। आनन्द बाज़ार पत्रिका, मलयाला मनोरमा या कन्नड़ प्रभा ने घटियापन का वह रास्ता नहीं पकड़ा, जो हिन्दी के अखबारों ने पकड़ लिया। क्यों? इसलिए कि इन भाषाओं के पाठकों की वैचारिक कर्म से वैसी दूरी नहीं है जैसी हिन्दी में है।

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    काकेश May 11, 2011 at 11:59 AM |

    आपका लेख पढ़कर अच्छा लगा क्योंकि मीडिया पर फब्ती कसता यह लेख मीडिया से ही आया है। लेकिन चिंता महज आजके मीडिया को लेकर नही है यह तो सदियों से चला आरहा है कि मीडिया हमेशा कुछ ताकतवर लोगों के हाथ में रहा है, यहाँ तक कि जो इतिहास हम पढ़ते हैं या हमें पढ़ाया जाता है वह कितना सही है इसपर भी शक किया जा सकताहै। इस सबके बावजूद कुछ अलग आवाजें समाज में हमेशा रही हैं जिन्होंने “पूनम को पूनम और मावस को मावस” कहने की हिम्मत दिखायी है, अफसोस इस बात का है वह आवाजें निरंतर कम होती जा रही है या उनका विस्तार कम होता जा रहा है। इसके पीछे ताकतवरों लोगों की सोची समझी बाजारी रणनीति तो है ही उन अलग आवाजों का समय के साथ ना चलना भी है। आज के समय में पूरे विश्व में इंटरनैट वैकल्पिक मीडिया के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है लेकिन कुछ बड़े मीडिया घरानों को छोड़ दें तो कितने छोटे मीडिया समूह हैं जो इंटरनैट की ताकत को पहचान पाये हैं।

    दूसरा एक और कारण है वह है कि अलग आवाज रखने वाले छोटे मीडिया समूह या पत्र – पत्रिकाओं के संचालकों में दूरगामी सोच का अभाव। यह लोग अपने सीमित प्रचार-प्रसार से खुश होते जान पड़ते हैं ना तो इनमें विस्तार की वह ललक दिखायी पड़ती है और ना ही वह नयी तकनीक को प्रति बहुत आशांवित जान पड़ते हैं। समाज को इसके लिये दोष देना मुझे उचित नहीं जान पड़ता। पाठक के पास जब कोई वैकल्पिक साधन नहीं होगा तो वह पढ़ेगा क्या? किसी जमाने में अमरीका के राष्ट्रपति चुनावों के मद्देनजर “ऐजेंडा सैटिंग थ्योरी” सामने आयी थी जिसके अनुसार मीडिया समाज के लिये ऐजेंडा तय करने का हथियार था, हमारे देश के सन्दर्भ में यह अब सच जान पड़ती है। जरूरत अब खबरों की खबर रखने की है लेकिन उसके लिये सामने कौन आयेगा और आयेगा तो क्या वह अपने सीमित संसाधनों से मुकाबले में खड़ा हो पायेगा।

    मुझे संदेह है।

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    sanjay chauhan pipalkoti May 13, 2011 at 2:04 PM |

    shah ji gafn…. shayad kuch yaad aaya hoga ….aapse mulakat birahi chamoli me alknanda ke kinare hui thi jab…waha par nadi bachao seminar hua tha…………….. uttrakhand me agar janaandolan agar jinda hai to aapki hi badolat ,warna yaha sab mookdarshak ban baithe hai….. bharstachar ke khilap jarri aandolan ko hamara aapko poora samarthan hai….
    ………………..kaun kahata hai ki aasman me ched nahi ho sakta jara ekk pathar rageev da jaise uchalkar to dikhao……..

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