आये चुनाव, गये चुनाव…मगर आगे क्या ?


राजीव लोचन साह
पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव निबट गये हैं और भारतीय जनता पार्टी की तूती पूरे देश में बजने लगी है। ‘चप्पा चप्पा भाजपा’ का नारा पहली बार सफल हुआ है। उत्तर प्रदेश जीत लेने के बाद भाजपा का अश्वमेध यज्ञ पूरा हो गया है। अब उसे चुनौती देने वाला कोई क्षत्रप नहीं बचा।
किसी जमाने में ऐसी ताकत कांग्रेस के पास होती थी। मगर अब उसका क्षरण हो गया है। तब से वक्त भी बहुत बदल गया। यह तो गजब का वक्त है। पिछले तीन सालों से मैं अच्छे-खासे लोगों को गड़बड़ाता हुआ देख रहा हूँ। औरों की क्या कहूँ, मैं खुद एक बार गड़बड़ा गया था। जिस रोज नरेन्द्र मोदी ने नोटबन्दी की घोषणा की थी, मैं उनका मुरीद हो गया था। एकबारगी मुझे लगा कि यह तो मास्टर स्ट्रोक है। काला धन अब एकदम सफाचट ! दो दिन लगे, यह समझने में कि यह तो ठेठ काला जादू है। हम से उम्रदराज या हमारे अन्य हमउम्र भी अगर इसी तरह गड़बड़ा गये हों तो किं आश्चर्यम् ?
नई उम्र के लोगों की कोई तालीम नहीं हुई है। अपनी पाठ्य पुस्तकों में उन्होंने ईमानदारी से जितना पढ़ा होगा, पढ़ा होगा। उसके बाहर जाकर पढ़ने वाले उनमें बहुत कम होंगे। पढ़ने की संस्कृति पिछले पचास सालों में लगातार कमजोर हुई है। मीडिया के असीम विस्तार के बाद मीडिया ही अब लोगों के दिमाग तैयार करता है। लोग एक या दो अखबारों से या पाँच-सात न्यूज चैनलों से अपनी समझ बनाते हैं। और ये सब अखबार और चैनल अपने कॉरपोरेट मालिकों के हितों के अनुसार एक खास दिशा को जाते दिखाई देते हैं। वैकल्पिक मीडिया या कहें कि सत्यान्वेषी मीडिया कॉरपोरेट मीडिया के घटाटोप में एकदम अदृश्य है। कॉरपोरेट मीडिया सिर्फ कॉरपोरेट साम्राज्यवाद को मजबूत करने का काम करता है। आर्थिक उदारीकरण के बाद उसकी दिशा जन साधारण के सुख-दुःख देखने की तो कभी रही ही नहीं। एक समय में, जब देश के संसाधनों को देशी-विदेशी कम्पनियों को लुटाने में यूपीए सरकार डट कर लगी थी, उसने मनमोहन सिंह की भी कम वाहवाही नहीं की। मगर इस लूट के चलते कुछ घोटालों के उजागर हो जाने के बाद जब मनमोहन सिंह अलोकप्रिय हो गये और चोरी पकड़ी जाने से बदनाम हुई कांग्रेस की विदाई तय हो गई, तो उसने भारतीय जनता पार्टी की ओर मुँह किया और उसमें भी उसने चुना नरेन्द्र दामोदर मोदी को। सारा का सारा कॉरपोरेट मीडिया मोदी के पीछे लग गया। कोई बड़ी कम्पनी जब अपना एक नया उत्पाद बाजार में लाती है तो अपने प्रबन्धन कौशल और धुआँधार प्रचार से कुछ ही समय में उसे जन सामान्य के दिल-दिमाग में स्थापित कर देती है। और यहाँ तो एक नहीं सैकड़ों कम्पनियाँ थीं, जो नरेन्द्र मोदी को स्थापित करने में लगी थीं। एक ‘राजनीतिक उत्पाद’ के रूप में नरेन्द्र मोदी हैं भी परफेक्ट! उनमें एक अभिनेता का कौशल है तो एक प्रखर वक्ता का भी। उनके चुटीले और लुभावने जुमले आसानी से जनता का मन मोह लेते हैं। उनके बोलते वक्त, खास कर जिस तरह मीडिया उन्हें प्रस्तुत करता है, सामान्य आदमी एक अनजानी दुनिया में खो जाता है, सपने देखने लगता है। फिर तर्क कहीं नहीं रहते।
सिर्फ नोटबन्दी को लें। नोटबन्दी से काले धन का सफाया हो गया होता तो इस चुनाव में इस तरह पानी की तरह पैसा क्यों बहता ? इस बार तो रेट बहुत बढ़ गये थे। 2012 के उत्तराखंड विधानसभा के चुनाव में एक वोट की कीमत पाँच सौ रुपया बताई गई थी। इस बार तो एक-एक घर में दो-दो हजार रुपये पहुँचाने की खबरें मिलीं। क्या यह सब साफ सुथरा धन था ? यदि नहीं था, तो नोटबन्दी से काले धन के सफाये के दावे का क्या हुआ ? मगर इसके बावजूद आज भी असंख्य लोग नोटबन्दी के पक्ष में खड़े हैं। इनमें वे भी शामिल हैं, जिन्हें नोटबन्दी ने जबर्दस्त चोट पहुँचाई।
मैं कुछ बुनियादी बातें करना चाहता हूँ और खास कर उनसे करना चाहता हूँ, जो हमारी उम्र के आसपास के हैं और थोड़ा-बहुत पढ़े लिखे हैं। पढ़े-लिखे से मतलब कि उन्होंने सिर्फ बी.ए.-एम.ए. की डिग्री ही नहीं ली, बल्कि उससे बाहर जाकर भी कुछ ऐसी किताबें पढ़ीं, जो आज से पच्चीस-तीस साल पहले लाइब्रेरियों में भी आसानी से मिल जाती थीं। जिनकी समझ दो-चार अखबार-चैनल पढ़-देख कर या सोशल मीडिया के हो-हल्ले से नहीं बनी है। मैं अपना तर्क यह मान कर शुरू करता हूँ कि नरेन्द्र मोदी बहुत ही मेहनती, ईमानदार, जनता के लिये बहुत ही चिन्तित और अपनी नीयत में बहुत साफ व्यक्ति हैं। मगर मैं यह भी तो जानता हूँ कि वे जिस भारतीय जनता पार्टी के नेता हैं, जिसमें आजकल बड़े-बड़े कामरेड और आन्दोलनकारी तक शामिल होते दिख जा रहे हैं, वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक राजनीतिक फ्रन्ट है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घोषित उद्देश्य भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाना है। वह पूरी तरह हिटलर की फासिस्ट विचारधारा से प्रेरित होकर बना संगठन है। स्वतंत्रता संग्राम में आर.एस.एस. का योगदान न सिर्फ शून्य था, बल्कि वह अंग्रेजों का मददगार ही रहा। उसके दुश्मनों में कांग्रेस तो कम रही, अल्पसंख्यक और कम्युनिस्ट ज्यादा रहे, क्योंकि योरोप में भी हिटलर के दुश्मन यहूदी और कम्युनिस्ट ही थे। गांधी की हत्या में आर.एस.एस. का प्रत्यक्ष हाथ रहा हो या न रहा हो, उनकी हत्या के बाद तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभ भाई पटेल ने आर.एस.एस. पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। आर.एस.एस. के लोग हाल-हाल तक गांधी की हत्या को ‘हत्या’ नहीं ‘गांधी वध’ कहा करते थे। हिन्दी में वध रावण या महिषासुर जैसे राक्षसों के मारे जाने के लिये प्रयुक्त होता है। अब क्या कोई कह सकता है या मोदी भी कसम खाकर यह कह सकते हैं कि उनका या उनकी पार्टी का आर.एस.एस. से न कोई सम्बन्ध है और न आगे रहेगा ? पुराने लोगों को याद होगा कि इमर्जेंसी के बाद इंदिरा गांधी को अपदस्थ करने के लिये जिस जनता पार्टी का गठन हुआ था, उसका विभाजन भी इसलिये हुआ था कि मधु लिमये जैसे समाजवादियों ने पार्टी में शामिल वाजपेयी-अडवाणी जैसे जनसंघियों की दुहरी सदस्यता का सवाल उठाया था। इन समाजवादियों का कहना था कि जनसंघी या तो जनता पार्टी के मेंबर रहें या फिर आर.एस.एस. के। इस मुद्दे पर जनता पार्टी टूट गई और भारतीय जनता पार्टी खड़ी हुई, जो आज अपने चरमोत्कर्ष पर है। बीस-पच्चीस साल पहले तक आर.एस.एस. की खबरें अखबारांे के ओने-कोने में कहीं सिमटी-सकुचाई सी मिलती थीं। अब उसके सर संघ चालक भागवत जी को मीडिया में राष्ट्रपति से भी ऊपर का दर्जा प्राप्त है। यह प्रताप अडवानी जी का है, जिन्होंने जनता पार्टी के संक्षिप्त शासन में ही सूचना प्रसारण मंत्री के रूप में कार्य करते हुए आकाशवाणी-दूरदर्शन में ही नहीं, अखबारों में भी हिन्दुत्व की विचारधारा के लोगों की भारी संख्या में भर्ती करा दी। आज उसी दूरदृष्टि से पनपे पेड़ों के फल भाजपा खा रही है।
मोदी यदि सचमुच देश में ‘अच्छे दिन’ ले आते हैं या एक ‘न्यू इंडिया’ बनाने में सफल हो जाते हैं तो भी अन्तिम उद्देश्य तो उनका भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना ही होगा। जबकि अपने संविधान के अनुसार भारत एक ‘समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष’ गणराज्य है। इस अन्तर्विरोध को कैसे समझा जाये ? हम अपने संविधान को खारिज कर उसी तरह एक भीड़ का हिस्सा बन जायें, जैसी प्रवृत्ति इन दिनों बन रही है ? कम्युनिस्ट होना या धर्मनिरपेक्ष होना इन दिनों एक तरह की गाली बना दिया गया है।
यह बात उम्रदराज लोगों के संदर्भ में की गई थी। नौजवानों, जिनका इस समय एक तरह से देश की आबादी में बहुमत है, से तो सीधा वार्तालाप करना भी असम्भव है। उनमें जो अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे हैं, उन्हें छोड़ें। मगर जो अच्छे-खासे प्रोफेशनल भी हैं, उनकी समझ जैसा कि एकदम शुरू में कह चुका हूँ, कॉरपोरेट मीडिया के माध्यम से बनी है। उन्हें दोष देना व्यर्थ है। उनकी समझ के अनुसार भारत धर्मनिरपेक्ष नहीं, उसी तरह का हिन्दू राष्ट्र है, जैसे कि पाकिस्तान एक इस्लामी राष्ट्र। यह समझ उनके अन्दर इतने गहरे तक धँस गई है कि यदि मैं यही बातें, जो यहाँ पर कर रहा हूँ, सोशल मीडिया में कह रहा होता तो मेरे ऊपर चौतरफा गालियाँ बरसने लगतीं। और सोशल मीडिया ? जब औपचारिक मीडिया अपनी जिम्मेदारी में ईमानदार नहीं है, तो सोशल मीडिया पर किसी का क्या नियंत्रण ? इसके आगे मैं एक पोस्ट लगा रहा हूँ, जो व्हाट्सएप पर मेरे पास न जाने कितने नंबरों से, कितनी बार आयी। शायद आपके पास भी आयी हो। पढि़ये:
‘‘कांग्रेस का जन्म आज से 132 साल पहले अफगानिस्तान में हुआ था। गाजी खान ने अंग्रेजो के साथ मिलकर यह पार्टी बनाई थी। गाजी खान के तीन लड़के थे- सबसे बड़ा फैजल खान उसके बाद सलीम खान और सबसे छोटा मोइन खान याने बाद में (मोती लाल नेहरू)। फैजल खान एक बीमारी की वजह से 14 साल की उम्र में ही मर गया। सलीम खान शादी के बाद कश्मीर मंे रहने लगा। उसी सलीम खान के वंशज की औलाद आज कश्मीर में फारुख अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला हैं, जो कांग्रेस के साथ हैं।
‘‘अब बात आती है गाजी खान की। गाजी खान ने चुनाव लड़ा पर कभी जीता नहीं। गाजी खान के मरने के बाद मोइन खान ने फायदे के लिए हिन्दू बन कर अपना नाम मोतीलाल नेहरू रख लिया। पर वो भी कभी चुनाव नहीं जीता। उसके बाद मोतीलाल की औलाद, जवाहरलाल नेहरू ने जिन्ना के साथ मिलकर रणनीति बनाई कि जब अंग्रेज 1947 में देश छोड़ें तो देश का बँटवारा करके जिन्ना को पाकिस्तान का पीएम बनाया जाएगा और नेहरू को इंडिया का पीएम बनाया जाएगा। जनता सरदार पटेल को पीएम बनाना चाहती थी, पर महात्मा गांधी ने नेहरू का साथ दिया। (इसीलिए गांधी हत्यारा मराठा नाथूराम गोडसे गांधी के खिलाफ था) और नेहरू को पीएम बना दिया गया।
‘‘फिर नेहरू की बेटी इन्द्रा जो फिरोजखान से निकाह करके फिर से मुसलमान बन गई। महात्मा गांधी ने लोगांे की आँखों में धूल झोंकने के लिए इन्द्रा को अपने नाम के आगे खान की जगह गांधी लगाने को कहा। उसी दिन से ये गांधी का नाम लगा कर देश को लूट रहे है। फिरोजखान के बाद राजीव खान के बाद सोनिया खान के बाद अब राहुल खान।
‘‘इस पोस्ट को इतना शेयर करो कि इस नकली गांधी परिवार की असलियत सभी को पता चले।’’
इसके बाद एक लम्बा-चौड़ा बखान है कि कैसे मुसलमानों को तमाम तरह की सुविधायें दी जा रही हैं और
हिन्दू किस तरह अपने ही देश में प्रताडि़त हैं। प्रताडि़त ! यह कौन सा इतिहास है भई ? मगर ऐसी चीजें एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित कर रही हैं, क्योंकि उन्होंने अपने आप से तो कुछ पढ़ा ही नहीं है। संविधान को ठेंगा दिखाते हुए देश को धर्मनिरपेक्षता से भगवाकरण की ओर ले जाने की सरकार समर्थित मुहिम का यह एक हिस्सा है। पिछले तीन सालों में शिक्षण और शोध संस्थानों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया है ताकि वहाँ से निकलने वाले युवा तर्क और ज्ञान से शून्य हो कर निकलें और फिर उन्हें एक उन्मत्त भीड़ का हिस्सा बनाया जाये। पुर्ण के एफ.टी.आई.आई. से दिल्ली के जे.एन.यू. और रामजस कॉलेज तक की घटनायें यही साबित करती हैं। आगे दिक्कत तब आयेगी, जब प्रचण्ड बहुमत के साथ मोदी सरकार सांवैधानिक संस्थाओं में भी छेड़छाड़ शुरू कर देगी। अब तक यह काम देशभक्ति-देशद्रोह की आड़ में हो रहा है। आगे अब खुल कर होगा, क्योंकि अब जनादेश का बहाना सरकार के पास होगा।
बड़ा ताज्जुब होता है, यह देख कर कि जिस आर.एस.एस. को शुरू जवानी में हम तवज्जो ही नहीं देते थे, हर जगह उनके दस-बीस कार्यकर्ता होते और हम उन्हें और उनकी शाखाओं को अनदेखा कर देते थे, उसकी विचारधारा आज हमें ही अप्रासंगिक कर पूरे देश में छा गई है। कम पढ़े या अधपढ़े लोग प्रत्यक्ष रूप में उसके प्रभाव में हैं तो जो पढ़े-लिखे हैं वे उसके बाहर चढ़े प्रगति और विकास के आवरण से भ्रमित होकर उसके साथ खड़े हैं।
‘सबका साथ, सबका विकास’ का यह नारा इन्दिरा गांधी के ‘गरीबी हटाओ’ के नारे की तरह बहुत जल्दी फुस्स हो जायेगा। तब इन्दिरा गांधी की तरह ही इमर्जेंसी आयेगी क्या, यह देखा जाना है। हालाँकि इमर्जेंसी में अखबारों में जो सेंसरशिप थी, वह तो आज के मीडिया ने स्वेच्छा से ओढ़ी हुई है ही। मगर धर-पकड़ और दमन उसी तरह होगा या उससे भी बर्बर, यह भविष्य के गर्भ में है।
‘सबका साथ, सबका विकास’ इस लगातार केन्द्रीकृत होती हुई राजनीति से सम्भव ही नहीं है। आजादी के बाद रूस के प्रभाव में आकर नेहरू सरकार ने विकास का जो मॉडल लिया, वह इन्दिरा सरकार तक आते-आते कोटा-परमिट राज में बदल गया। तब दूसरे तरह की लूट-खसोट और भ्रष्टाचार थे। नब्बे के दशक में हुए ‘गैट’ समझौते के बाद आये आर्थिक उदारीकरण ने राष्ट्रों की सार्वभौमता ही खत्म कर दी है। अभी किसी भी विकासशील देश का राष्ट्रप्रमुख बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का वायसराय मात्र होता है। उसका काम यह नहीं होता कि अपनी जनता के दुःख-दर्दों का समाधान करे। उसका वास्तविक काम यह होता है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की लूट-खसोट को सुगम बनाये, सुविधापूर्वक होने दे। अब यह काम वह रबड़ के बबुआ जैसे उदास मनमोहन सिंह की तरह करे या ऊर्जा से दहकते प्रत्युत्पन्नमति वाले, प्रखर वक्ता नरेन्द्र मोदी की तरह। कुल मिला कर जनता को बदहाली में जाना है और देश के संसाधनों को उजड़ना ही है।
सबके विकास का तरीका वह है, जिसे महात्मा गांधी ने ग्राम गणराज्य कहा था और राममनोहर लोहिया ने चौखम्भा राज्य और जो अंग्रेजों द्वारा भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने से पहले इस देश में चलता था, यानी एक विकेन्द्रित शासन व्यवस्था। हमारे संविधान में 73वें-74वें संविधान संशोधन कानून के रूप में वह मौजूद है, मगर दुर्भाग्य से उसे कभी आजमाया ही नहीं गया। इस कानून को लागू करना प्रदेश सरकारों के हाथ में है, मगर इससे राजनेताओं, नौकरशाहों और माफियाओं के खाने-पीने पर रोक लगती है और सत्ता समुदाय के हाथ में आ जाती है, अतः सारी सरकारें इससे विमुख ही रहीं। 73वें-74वें संविधान का पारित होना और देश में आर्थिक उदारीकरण का लागू होना लगभग एक ही समय में हुआ। यह विडम्बना है कि इन पच्चीस वर्षों में आर्थिक उदारीकरण का बर्बर और अमानवीय चेहरा कॉरपोरेट मीडिया की तमाम कोशिशों के बावजूद बेनकाब हो गया है, मगर 73वें-74वें संविधान कानूनों को लागू करने की पहल भी नहीं हुई। इसी अंक में अन्यत्र हम इस विषय पर अपना एक पूर्व प्रकाशित लेख पुनः प्रकाशित कर रहे हैं। हालाँकि आज के माहौल में जब बहस सायास दूसरी ओर को ले जायी जा रही है, वह बेसुरा सा लगेगा, मगर पाठकों से आग्रह है कि उसे अवश्य पढ़ें। ‘सबका साथ, सबका विकास’ के मायावी नारे से जितनी जल्दी बाहर निकलें, उतना अच्छा। इस महादेश को ‘प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र’, जिसमें हम वोट के द्वारा अपना एक प्रतिनिधि विधायिका में भेज कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं, से ‘सहभागितामूलक लोकतंत्र’, जिसमें हम लगातार अपनी जरूरतों के मुताबिक अपना विकास करते हैं, की ओर ले जाना ही एकमात्र रास्ता है। उसी रास्ते पर चल कर देश धर्मान्धता से बच सकता है और छोटे से छोटे व्यक्ति का भी विकास हो सकता है। अन्यथा न देश के स्तर पर कोई बदलाव आ सकता है, न उत्तराखंड के। सिर्फ चेहरे बदलेंगे, और कुछ नहीं।

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