सम्पादकीय


देश लगातार नाकामयाबियों, बल्कि विघटन की ओर जा रहा है और हम देशवासी हैं कि चैन की वंशी बजा रहे हैं। ऐसा क्यों ? ऐसा इसलिये क्योंकि हमारे दिमाग में यह भर दिया गया है कि जो कुछ हो रहा है, वह सब हमारे भले के लिये है। नोटबन्दी को लें। अधिसंख्य लोगों को यह विश्वास हो गया कि इससे कालाधन समाप्त हो जायेगा और उनके लिये रोजगार और आमदनी के नये-नये रास्ते खुलेंगे। नोटबन्दी हुए छः माह से ज्यादा हो गये हैं और ये दोनों बातें सरासर झूठ निकलीं। मगर अभी भी वह आक्रोश या बेचैनी कहीं नजर नहीं आ रहे हैं, जो एक आत्मसम्मानी देश की मुखर जनता में होने चाहिये। पाकिस्तान या कश्मीर के मामले को लें। मोदी सरकार का वायदा तो सीमा पार से नियंत्रित आतंकवाद को समूल नष्ट करने का था। आठ महीने पहले सर्जिकल स्ट्राइक का हो-हल्ला मचा कर ऐसा माहौल बना दिया गया था मानो पाकिस्तान की कमर ही पूरी तरह तोड़ डाली गयी हो। मगर उसके बाद से न सिर्फ सीमा पर पाकिस्तान का दबाव लगातार बढ़ रहा है, बल्कि कश्मीर घाटी में हालात भी बिगड़ते जा रहे हैं। सबसे ताजा उदाहरण युवा सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट उमर फैयाज का है, जिनकी आतंकवादियों ने तब हत्या कर दी, जब वे एक पारिवारिक शादी में भाग लेने के लिये छुट्टियों में घर आये हुए थे। दहशगर्दों ने यह खतरा उठा कर भी कि इससे आम कश्मीरी उनसे नफरत करने लगेंगे, इस बर्बर घटना को अंजाम दिया। उनकी रणनीति साफ है कि वे कश्मीरियों को यह संदेश दे दें कि भारतीय सेना या पुलिस में भर्ती होने से बाज आयें। यह कश्मीर समस्या के एक और खतरनाक मोड़ पर जाने की शुरूआत है। भारतीय राष्ट्र-राज्य से कश्मीरियों का मोहभंग बहुत पहले ही हो चुका है। कुछ नौकरियाँ और कुछ पर्यटन आदि के रूप में रोजगार ही कश्मीर को भारत से भावनात्मक रूप से जोड़े हुए थे। वह कच्चा धागा भी टूट गया तो सिर्फ सेना के दम पर वहाँ भारतीय सत्ता बनाये रखने के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा।

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